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उज्जैन के इस शिवलिंग के दर्शन मात्र से रूपवान हो जाते हैं मनुष्य, पूजन से मिलती है सकारात्मक ऊर्जा
मंदिर के पुजारी पं. शशांक त्रिवेदी ने बताया कि मंदिर में भगवान शिव के दो शिवलिंग स्थापित हैं, जो कि काले और गौर वर्ण के पाषाण के बने हुए हैं। यहं एक जलाधारी में सफेद उज्जवल पाषाण का शिवलिंग है जिसका पूजन अर्चन करने से सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है। जबकि उसी के आगे काले पाषाण का शिवलिंग है, जिसका पूजन अर्चन करने से नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है। पंडित शशांक त्रिवेदी ने बताया कि ऐसी मान्यता है कि भगवान के दर्शन करने मात्र से ही मानव रूपवान हो जाता है। यह लिंग रूप, धन, पुत्र तथा स्वर्ग प्रदाता है। यह लिंग सर्वदा रूप एवं भुक्ति-मुक्ति प्रदान करता है। ये रूपेश्वर महादेव रूप तथा सौभाग्यप्रद हैं। इनका पूजन अर्चन करने से नकारात्मक ऊर्जा समाप्त हो जाती है और हमें सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है। मंदिर में प्रतिदिन भगवान के विशेष पूजन अर्चन के साथ उनके जलाभिषेक का क्रम सतत् जारी रहता है।

मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश पर जाने से पहले फर्श पर शिव-पार्वती की प्राचीन मूर्ति है, जबकि पास में अवतारों की प्राचीन मूर्तियां हैं, सम्मुख कलांकित पाषाण के मध्य में चक्र निर्मित है तथा फर्श पर ही विष्णु की तथा पास में ही वहीं देवी की मूर्ति स्थित है। बाकी दीवार पर अतिप्राचीन वरदानी माता भी विराजमान हैं, जो कि यहां पर महिषासुर मर्दिनी के स्वरूप में दर्शन दे रही हैं। एक ही सफेद पाषाण पर मध्य में ढाल, धनुष आदि आयुधों सहित अत्यंत कलात्मक एवं आकर्षक साढ़े पांच फीट ऊंची दिव्य मूर्ति स्थापित है, जिसके दोनों ओर शिव-परिवार सहित ब्रह्मा, विष्णु आदि मूर्तियां उत्कीर्ण हैं।

महादेव ने देवी पार्वती को पाद्मकल्प में पद्म राजा की कथा सुनाते हुए कहा कि राजा ने आखेट पर सहसों, वन्य जीवों का वध किया। फिर एक अत्यंत सुरम्य वन में अकेले एक आश्रम में प्रवेश किया तथा वहां एक तापसी रूपधार्णि कन्या को उसने देखा। राजा ने मुनिवर के संबंध में पूछा। उसने कहा मैं कण्व ऋषि को पिता मानती हूं। उस मधुर भाषिणी कन्या को अपनी पत्नी बनाने का राजा ने प्रस्ताव रखा, उसने ऋषि के आने तक प्रतीक्षा करने का कहा किन्तु कन्या ने विवाह हेतु सहमति दे दी तथा राजा ने गंधर्व विधि से कन्या से विवाह कर लिया। जब कण्व ऋषि लौटे तो उन्होंने कन्या व राजा दोनों को कुरूपता का शाप दे डाला किंतु कन्या ने कहा मैंने स्वयं इनका पतिरूप में वरण किया है। शापमुक्ति हेतु ऋषि ने दोनों को महाकालवन भेजा जहां एक रूपप्रदायक लिंग के दर्शन कर दोनों सुरूप हो गये। यह लिंग रूपेश्वर नाम से प्रसिद्ध हुआ।